तुझको रुकना नहीं बराबर चल



तुझको रुकना नहीं बराबर  चल 

मुक्तक 


1


तुझको रुकना नहीं बराबर  चल

सर झुकाकर  नहीं उठाकर चल

पाप  के   पर्वतों  पे  मत  चढ़ना

तू  सदा पुण्य  की धरा  पर चल


2


ख़ुद को हर दुख से दूर कर ले तू

चाहतों   में  भी  नूर  भर  ले   तू

ज़िन्दगी  तब    ही   मुस्कुराएगी

प्यार  कुछ तो  ज़रूर  कर  ले तू


3


इस  ज़माने   की  चोट  सहने दे

इसको अपनी ही धुन में बहने दे

खिल उठेगी ये तप के क॔चन सी

अनुभवों  की  तपिश में रहने  दे


4


अपने घावों  को  खिलखिलाने दे

अपना दुख  भी   इन्हें   सुनाने  दे

टीसते     ही    रहेंगे      ये    वरना

इनको   भी   खुलके  मुस्कुराने दे



डॉ जयसिंह आर्य दिल्ली

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