गंधर्वपुरी में कायोत्सर्गस्थ एकल तीर्थंकर प्रतिमाएँ
डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’,
22/2, रामगंज, जिंसी, इन्दौर, मो 9826091247
राजकीय संग्रहालय में गंधर्वपुरी में तीर्थंकरों की एकल प्राचीन प्रतिमाएँ बहुसंख्य हैं। इनमें से सत्तरह पद्मासन प्रतिमाओं का परिचय ‘‘एकल पद्मासन तीर्थंकर प्रतिमाएँ’’ शीर्षक से दिया है। यहाँ नौ कायोत्सर्गस्थ प्रतिमाओं का संक्षिप्त परिचय यहाँ प्रस्तुत है। ये सभी प्रतिमाएँ गंधर्वपुरी राजकीय संग्रहालय के खुले वाड़े में रखीं हैं।
1. कायोत्सर्गस्थ एकल तीर्थंकर प्रतिमा- यह प्रतिमा बलुआ पाषाण की समपादासन में कायोत्सर्गस्थ है, खण्डित होने पर भी मनोरम है। पादपीठ में कोई लांछन है, किन्तु सीमेन्ट के आधार पर स्थिरीकृत होने से छुप गया है। अनेक वर्षों से धूप, शर्दी, गर्मी, वर्षात् में खुले में रखी रहने से ललाट और वक्ष के पाषाण की पपड़ी उधड़ रही है। जिससे श्रीवत्स भी नष्ट हो गया है। इसका दक्षिण कर कोहनी के नीचे भग्न है। उष्णीष युक्त कुंचित केश हैं। कमल-पंखुड़ियों युक्त सुन्दर प्रभावल उत्कीर्णित है। चरणचौकी पर समानान्तर में दोनों ओर चामरधारी देव शिल्पित हैं। धामरधारियों के आभूषण विशिष्ट हैं, इन्हें बनमाला धारण किये हुए भी दर्शाया गया है। इनके बाह्य पार्श्व के स्थान में मूलनायक के बायें ओर तीर्थंकर की यक्षी शासनदेवी और दक्षिण पार्श्व में शासन देव यक्ष शिल्पित है। मूल प्रतिमा के कर-मूल से स्कंधों तक के परिकर में कोई शिल्पांकन नहीं है। मस्तक के दोनों ओर सपत्नीक पुष्पवर्षक माल्यधारी गगनचर देव हैं। वे कुछ खण्डित हैं। इनसे ऊपर का वितान भाग छत्र- मृदंगवादक आदि भग्न और अप्राप्त हैं।
2. कायोत्सर्गस्थ एकल तीर्थंकर प्रतिमा- बलुआ पाषाण की ही यह प्रतिमा अधिक क्षरित हो गई है। फिर भी वक्ष पर श्रीवत्स देखा जा सकता है। भुजाओं से नीचे के हस्त भग्न हैं। कुंचित केश और उष्णीष स्पष्ट है। प्रभावल त्रिस्तरीय बृहत् व कलायुक्त है। चँवर ढोराने वाले चमरी देव बहुत खण्डित हैं, तथापि उनके आकर अवशिष्ट हैं। त्रिछत्र स्पष्ट है, उसके ऊपर दुंदुभिवादक की पूर्ण आकृति है, किन्तु अत्यंत क्षरित है। प्रथम दृष्ट्या प्रतीत होता है कि यह एक लघु पद्मासन तीर्थंकर प्रतिमा है, किन्तु मृदंग भले ही खण्डित है किन्तु हाथ थाप देने के लिए उतने ही दूरी पर हैं, पद्मासन नहीं बन सकती है। एक और पहचान शेष है। इसकी भुजाओं में भुजबंध पहने दर्शाया गया है। मृदंगवादक के दोनों ओर अशोक वृक्ष की शाखाओं से लंबे-लंबे पत्रगुच्छक लटकते हुए दर्शाये गये हैं।
3. कायोत्सर्गस्थ एकल तीर्थंकर प्रतिमा- इय क्षरित व भग्न कायोत्सर्गस्थ प्रतिमा की उदरावली, किंचित् श्रीवत्स, उष्णीष युक्त घुंघराले केश हैं। कर्ण स्कंधों को स्पर्शित हैं। पादयुगलों के समानान्तर दोनों पार्श्वों में चामरधारी शिल्पित हैं। दाहिनी ओर एक अपेचाकृत बड़ी स्त्री आकृति उत्कीर्णित है। शेष परिकर भग्न और अनुपलब्ध है।
4. कायोत्सर्गस्थ एकल तीर्थंकर प्रतिमा- बलुआ पाषाण फलक पर शिल्पित इस प्रतिमा का घुटनांे से नीचे का भाग और टेंहुनी से नीचे का बाम हस्त खण्डित है। चामरधारी खण्डित होकर नष्ट हो गये हैं। स्कंधों को स्पर्श करते कर्ण, उष्णीषयुक्त कुंचित केश बृहत् कलात्मक भामण्डल है। झूलता हुआ सुन्दर छत्रत्रय, तदोपरि अर्धमृदंगवादक है, उसके दोनों ओर एक-एक आकृति है, जिनकी पहचान नष्ट हो गई है। माल्यधारी देव भी खण्डित व नष्ट हैं। इस प्रतिमा में एक विशिष्टता है कि तीर्थंकर के वाम भाग में एक द्विभंगासन में स्त्री छबि उत्कीर्णित है, यह आभरणों से भूषित है, अन्य पात्रों से बड़ी और तीर्थंकर से छोटी है।
यह प्रतिमा भी घुटनों से नीचे खण्डित और अप्राप्त है। चामरधारी रहे हैं, वाम भाग के चमरी का शिर दृष्ट है। प्रतिमा का श्रीवत्स अंशतः अवशिष्ट है। कर्ण स्कंधों को स्पर्श कर रहे हैं। सुंदर प्रभावल है, एक-एक माल्यधारियों की दोनों ओर उपस्थिति दर्शाई गई है। बड़ा सा छत्रत्रय और उसके ऊपर दुंदुभिवादक है। छत्रत्रय के दोनो ओर से अशोकवृक्ष के पत्रगुच्छ अवलंबित हैं।
6. कायोत्सर्गस्थ एकल तीर्थंकर प्रतिमा- कायोत्सर्गस्थ सपरिकर यह प्रतिमा कई विशेषताओं युक्त है। यदि यह खण्डित न होती तब प्रतिमा विज्ञान का यह एक अनुठा उदाहरण होता, किन्तु इसका परिकर कहीं पूर्ण तो कहीं अंशतः खण्डित है। दोनों हाथ भग्न हें, वाम कर कलाई से नीचे का भग्न है तो दक्षिण भुजा से खण्डित है। वक्ष पर श्रीवत्स उपस्थित है, मुखमण्डल भग्न है, तथापि उष्णीष का अस्तित्व दृष्टिगत है, प्राभावल सुन्दर पंखुड़ियों युक्त है। तीर्थंकर प्रतिमा के चरणों के पार्श्वों में जो चँवरधारी देव शिल्पित होते हैं, यहाँ की आकृतियाँ पूरी तरह भग्न हैं, मात्र स्थान और भग्न की गई छबियों के किंचित् अवशेष हैं। तीर्थंकर के वाम पार्श्व में अपेक्षाकृत एक बड़ी राजसी मुद्रा चामरधारी की भूमिका में है, क्योंकि यह दाहिने हाथ से चँवर ढुराते हुए शिल्पित है। तीर्थंकर के दक्षिण पार्श्व में एक देवी उत्कीर्णित है, इसके वाम हस्त की हथेली में चक्र दर्शाया गया है।
प्रतिमा के प्रभावल के दोनों ओर माल्यधारी पुष्पवर्षक देव हैं। दाहिनी ओर का एक ही माल्यधारी है, किन्तु बायीं ओर के पुष्पवर्ष के बाह्य में एक बड़ी देवी है, जो गगनचर की ही देवी प्रतीत होती है। वितान का शेष भाग भग्न है। दाहिने पुष्पवर्षक के बाह्य में कुछ पीछे को बड़ा सा बहिर्मुख शार्दूल शिल्पित है।
विश्लेषण- 1. इसमें चामरधारियों के स्थान भग्न होने और एक ही आकृति के हाथ में चमर लिये हुए है, ऐसा उदाहरण हमने अन्यत्र नहीं देखा है। 2. चरणों के पार्श्वों में जो भग्न स्थान हैं उनमें द्विभंगासन में तीर्थंकर के यक्ष-यक्षी शिल्पित रहे हों। लेकिन चामरधारी देव एक रखने की परम्परा नहीं हैं।3. चामरधारी तीर्थंकर के गृहस्थ अवस्था का भाई राजा या राजकुमार हो सकता है क्योंकि इसके राजसी आभूषण भी हैं। 4. तीर्थंकर के दाहिनी ओर जो स्त्री आकृति है उसके बायें हाथ की हथेली में चक्र दर्शाया गया है और दक्षिण कर नीचे की ओर लम्बित है, उस में कोई अस्त्र या स्वयं का दुकूल पकड़े हुए प्रतीत होता है। 5. देवी प्रायः तीर्थंकर के बायें ओर शिल्पित किये जाने का नियम है। इस स्त्री पात्र की उपस्थिति यह कौन है इसका निर्धारण परिकर भग्न होने के कारण सम्भव नहीं है, केवल अनुमान ही किया जा सकता है। 6. केवल एक तरफ शार्दूल के शिल्पन से प्रतीत हो ता है कि यह सपरिकर तीर्थंकर प्रतिमा स्वतंत्र नहीं है, अपितु अन्य प्रतिमाओं के संयुक्त शिल्पांकन का एक भाग है।
7. कायोत्सर्गस्थ एकल तीर्थंकर प्रतिमा- यह प्रतिमा कटि से नीचे पूर्ण भग्न व अप्राप्त है। यह स्तंभयुक्त देवकुलिका में स्थापित है। देवकुलिक शिखरयुक्त है। कटि से नीचे खण्डित होने पर भी इसे कायोत्सर्गस्थ प्रतिमाओं में इस कारण परिगणित किया गया है, क्योंकि सदि यह प्रतिमा पद्मासनस्थ होती तब पाश्वै के दोनों स्तंभ और दूर-दूर होते। तीर्थंकर का उष्णीष, ग्रीवा-त्रिवली, उष्णीष और कुंचित केश हैं। प्रतिमा के बाईं ओर के शार्दूल का कुछ भाग अवशिष्ट है।
8. कायोत्सर्गस्थ एकल तीर्थंकर प्रतिमा- बलुआ पाषाण में ही निर्मित इस प्रतिमा का जंघ से नीचे का पूर्ण भाग हाथों सहित खण्डित और अप्रप्त है। अवशिष्ट प्रतिमा के दोनों पार्श्वों में स्तंभ हैं, इससे ज्ञत होताा है यह स्तंभयुक्त देवकुलिका में स्थापित रही होगी। इसके वक्ष पर श्रीवत्स लांछन स्पष्ट है। ग्रीवा-त्रिवली, कुंचित केश, उष्णीष और कलायुक्त प्रभाव दृष्ट है। शेष वितान भाग खण्डितत और अप्राप्त होने से परिकर का शिल्पांकन अज्ञात है।
9. कायोत्सर्गस्थ एकल तीर्थंकर प्रतिमा- सामान्य पादपीठ पर समपादासन में कायोत्सर्ग जिन स्थापित शिल्पित हैं। इनका उदर-त्रिवली और वक्षस्थ श्रीवत्स लांछन स्पष्ट है। शेष स्कंधों से ऊपर के शिल्पांकन का शिलाफलक खण्डित व अप्राप्त है। तीर्थंकर की चरण चौकी से कुछ नीचे अलग आसन टंकित कर दोनों पार्श्वों में चामरवाहक देवों को चमर डुराते हुए शिल्पित किया गया है। दोनों चँवरी आभूषणों से भूषित हैं,, किन्तु इनके आभूषण अलग हटकर कुछ ग्रामीण परिवेश से प्रभावित जान पड़ते हैं।
इस तरह उक्त नौ कायोत्सर्गस्थ प्रतिमाओं में कुछ में कई विशेषताएँ हैं, जो अन्य सामान्य प्राचीन प्रतिमाओं में दृष्टिगत नहीं होती हैं। ये सभी प्रतिमाओं का समय 9वीं से 12वीं शती ईस्वी अनुमानित किया गया है।