ज्ञान परम्परा मानव जाति को बचाने एवं भविष्य के निर्माण का माध्यम- प्रो भारद्वाज
दस दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का समापन
लाडनूं 28 फरवरी (प्रेषक शरद जैन सुधांशु, लाडनूं)’आचार्य सिद्धसेन दिवाकर कृत सन्मतितर्कप्रकरण’ विषय पर दस दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का समापन समारोह समणी नियोजिका मधुरप्रज्ञा जी के सान्निध्य में जैन विश्व भारती संस्थान के आचार्य महाश्रमण आडिटोरियम में हुआ। संस्थान के जैनविद्या एवं तुलनात्मक धर्म-दर्शन विभाग के तत्वावधान एवं भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के प्रायोजकत्व में आयोजित इस समारोह की अध्यक्षता करते हुए संस्थान के कुलपति प्रो बच्छराज दूगड ने कहा कि सन्मतितर्क प्रकरण के माध्यम से अनेकात और स्याद्वाद का तार्किक विश्लेषण समझा जा सकता है। उन्होने कहा कि इन दस दिनों में जैन न्याय व ज्ञान मीमांसा को समझने का जो प्रयास हुआ है, इससे ज्ञान की वृद्वि हुई है। उन्होंने कहा कि सत्य सापेक्ष होता है, सत्य को जानने का लक्ष्य ही व्यक्ति को ज्ञान तक ले जाता है। कुलपति प्रो दूगड ने ज्ञान परम्परा के विभिन्न विद्वानों की चर्चा करते हुए कि आप, मैं, व हम सबके विचार जानने के बाद भी जो शेष रह जाता है, उसे मिलाने के बाद ही सत्य पूर्ण हो सकता है।
समारोह के मुख्य अतिथि महर्षि वाल्मिकी विश्वविद्यालय हरियाणा के कुलपति प्रो रमेशचन्द भारद्वाज ने कार्यशाला में समागत विद्वानों को बधाई देते हुए कहा कि सन्मतितर्कप्रकरण के विश्लेषण के माध्यम से आपका ज्ञानार्जन हुआ है। जरूरत है कि इस ज्ञान को माध्यम बनाकर प्राकृत ग्रंथों को समझकर भारतीय ज्ञान परम्परा को आगे बढाने के लिए प्रयास किये जाये। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा केवल ज्ञान नहीं है बल्कि मानव जाति को बचाने एवं भविष्य के निर्माण का माध्यम है। प्रो भारद्वाज ने कहा कि मौलिक ग्रंथों को समझने के लिए तीन सूत्रों यथा काल को दृष्टिगत, वर्तमान संदर्भ एवं प्रांसगिकता एवं ज्ञान को प्रसारित करने का भाव का औचित्य होना चाहिए। इसके साथ ही आने वाली समस्या को सातत्यपूर्वक समझने से ही ज्ञान की आराधना संभव है।
सान्निध्य प्रदान करते हुए समणी नियोजिका समणी मधुरप्रज्ञा ने कहा कि गंभीर अनुशीलन, सैद्वांतिक व्याख्या से ओतप्रोत समन्मतितर्क ग्रंथ वर्तमान में भी प्रांसगिकता है। 5वीं सदी का यह ग्रंथ आज भी सही दृष्टि प्रदान कर रहा है। उन्होंने ज्ञान परम्परा के आचार्यों की चर्चा करते हुए कहा कि भगवान महावीर का एक नाम भी सन्मति था। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि जैन विश्वभारती के पूर्व अध्यक्ष धर्मचन्द लूंकड थे। कार्यशाला के समन्वयक प्रो आनन्दप्रकाश त्रिपाठी ने दस दिवसीय कार्यशाला की विस्तृत रिर्पोट प्रस्तुत की। उन्होंने हुए सभी समागतों का आभार भी व्यक्त किया। विभाग की प्रो समणी ऋजुप्रज्ञा ने स्वागत वक्तव्य दिया। इस अवसर पर संभागी डाॅ विजय जैन, डाॅं संतोष जैन, जिनेन्द्र जैन ने अपने अनुभव प्रस्तुत किये। मुमुक्षु रक्षा द्वारा प्रस्तुत मंगलसंगान से कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। अतिथियों का स्वागत प्रो रेखा तिवाडी, प्रो बीएल जैन आदि ने किया। कार्यक्रम का संयोजन डाॅ सत्यनारायण भारद्वाज ने किया। कार्यशाला में देश भर से समागत विद्वतजनों को अतिथियों द्वारा प्रमाण पत्र प्रदान किये गये।
-शरद जैन सुधांशु , जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय, लाडनूं (राजस्थान)