माँ ! तूने तो मुझे कई वर्षों शौंचाया है


 


माँ ! तूने तो मुझे कई वर्षों शौंचाया है


(मातृ दिवस के उपलक्ष्य में विशेष)

-डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’

वो माँ- बेटी का हृदयस्पर्शी वार्तालाप,
अनजाने में पिता ने सुना
द्रवित हो वह अश्रुपूरित हुआ
दो वाक्यों में अन्तर्मन की गाथा को सुना।

माँ थी एक माह तक गहन कक्ष अस्पताल के
ब्रेन ट्यूमर की हुई थी शल्य चिकित्सा
दो हफ्तों तक नहीं था होश
सब थे परेशान, परिजन कर रहे थे सुश्रूषा।

बेटी माँ का हाथ अपने सिर पर रख
माँ के आंचल में दुबकी रहती
दिन-रात, भूख-प्यास न निद्रा की परवाह
माँ! माँ!! और माँ की चेतना की आश करती।

डॉक्टर पीयूष प्रशांत की मेहनत रंग लाई
चौदह दिवस बाद माँ ने अंगुली हिलाई
सभी के चेहरों पर मुस्कान लौट आई
माँ ने आँखें खोलीं तो सबको खिलाई मिठाई।

कुछ दिनों बाद डॉक्टर ने हिदातों
के साथ माँ को घर भेजा
माँ की माँ, बड़ी बेटी-दामाद
पति, बेटा सबने की भरपूर सेवा ।

अभी भी अचल थी माँ
उठाना बैठाना सबकी दरकार थी
माँ को अस्थायी शौचोपकरण पर बैठाकर
बेटी उसे स्वच्छ कर रही थी।

इसी बीच माँ बोली अरी बेटी!
तुझे शुचि करना पढ़ रहा है
माँ! इसमें क्या बड़ी बात है
तूने तो मुझे बचपन के कई वर्षों शौंचाया है।

पिता, पर्दे की ओट में ये वार्ता सुनकर
स्वयं में अश्रु-स्नान कर रहा था
निज को धन्य व गुमान कर रहा था
ऐसी बेटी सबको दे ईश्वर ये अर्ज कर रहा था।

माँ-बेटी ये नहीं जानती कि उनकी
वार्ता पिता भी सुन रहा है
एक वर्ष बाद इस कविता से
उनका यह रहस्य खुल रहा है।

माँ को रहती बच्चों से एक आस
वे प्रगति की ऊँचाइयाँ छुएँ
उन्हें भूलें नहीं, स्मृत रखें
चाहे दूर रहें या रहें पास।

-डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’, 22/2, रामगंज, जिंसी, इन्दौर, 9826091247

जैन समाज झुमरीतिलैया के द्वारा जरूरत मंद लोगो को 10 रुपये में जरूरत का सामान उपलब्ध कराया

 






जैन समाज झुमरीतिलैया के द्वारा जरूरत मंद लोगो को 10 रुपये में जरूरत का सामान उपलब्ध कराया 


झुमरीतिलैया, श्री दिगंबर जैन समाज के तत्वाधान में ‘हेल्पिंग हैंड्स’ ग्रुप के द्वारा आज लगभग  1100 जरूरतमंद लोगों के बीच 5000 से अधिक  दैनिक जीवन में काम आने वाले सामान मात्र रु10 में दिया गया आज प्रातः 9रू00 इस कार्यक्रम का उद्घाटन जैन समाज के मंत्री नरेंद्र झाझंरी नीलम सेठी आशा गंगवाल निवर्तमान पार्षद पिंकी जैन ने संयुक्त रूप से किया हेल्पिंग हैंड्स के सदस्यों ने सभी का तिलक लगाकर दुपट्टा पहना कर स्वागत किया आए हुए सभी महिला पुरुष युवा युवतियां बच्चे ने क्रम से आकर अपने पसंद का सामान लिया सेवा के इस अनूठे सेल कार्यक्रम में नए एवं पुराने उपयोगी सामान रखे गए थे अटैची बैग साइकिल महिलाओं के लिए साड़ी लेडीज कुर्ती सूट स्वेटर फैशन के समान चूड़ी बिंदी आदि बच्चों के लिए खिलौना जींस बाबा सूट टी-शर्ट कपड़ा जूता चप्पल स्कूल बैग पुरुष युवाओं के लिए जैकेट जींस शर्ट कुर्ता पजामा कोट पेंट बंडी नाइट सूट आदि घर के दैनिक जीवन में काम आने वाले समान लोगों ने अपनी पसंद से लिए जैन समाज के मंत्री नरेंद्र झाझंरी एवं पार्षद पिंकी जैन ने इस मौके पर अपने संबोधन में कहा कि हेल्पिंग हैंडस ग्रुप मे शामिल समाज के सभी बच्चे बधाई के पात्र हैं जरूरतमंदों की सेवा मे युवा पीढ़ी के आगे बढ़ने से समाज और राष्ट्र मजबूत होता है यह मनुष्य जीवन अनमोल है जैन धर्म में परिग्रह का त्याग एवं जियो और जीने दो की महता है जरूरतमंदों के प्रति सहयोग की भावना एवं संवेदना ही जीवंत कार्य है इस नेक कार्य के लिए समाज के सह मंत्री राज छाबड़ा कोषाध्यक्ष सुरेंद्र काला ललित सेठी कमल जैन सेठी, सुरेश झाझंरी सरोज जैन सुशील जैन छाबड़ा लाला सोगानी,लट्टू जैन ने हेल्पिंग हैंड्स कार्यक्रम के परियोजना निदेशक प्रियंका जैन छाबड़ा अभिषेक जैन गंगवाल, अमित जैन सेठी ,इसान जैन कासलीवाल,शिखा जैन गंगवाल, खुशबू जैन सेठी और उनकी पूरी टीम  के अच्छे कार्य के लिए आभार जताया और शाबाशी दी जैन समाज के मीडिया प्रभारी राजकुमार जैन अजमेरा,नविन जैन ने बताया कि आगे भी हेल्पिंग हैंड्स के सदस्यों के द्वारा जरूरतमंदों की सेवा के लिए कार्य किए जाएंगे ।हेल्पिंग हैंड्स ग्रुप ने जैन समाज जैन महिला समाज जैन युवक समिति के सदस्यों के प्रति कार्य में सहयोग के लिए भी अपना आभार प्रकट किया अनुमंडल पदाधिकारी एवं प्रशासन के सहयोग के लिए उनको धन्यवाद दिया ।साथ ही हेल्पिंग हेण्ड ग्रुप  पूरे भारत के जैन समाज से आह्वान करती है की इस तरह का आयोजन अपने अपने शहर में अवश्य करे। यह मानव सेवा का बहुत बड़ा कार्य है।

आचार्यवर को पड़गाहन करते समय आकस्मिक निधन







आचार्यवर को पड़गाहन करते समय आकस्मिक निधन


आचार्यश्री सुनीलसागर जी का पड़गाहन कर ले जा रहे थे अपने निवास, हुआ आकस्मिक मरण, अजमेर की इस दुखद घटना ने हर हृदय को द्रवित कर दिया।


तन पर सिर्फ धोती-दुपट्टा, कोई मोह-माया नहीं, निर्मल भावों के साथ, अजमेर शहर के धर्म निष्ठ परिवार श्री मिश्रीलाल जी गदिया ज्ञानोदय तीर्थ नारेली कोषाध्यक्ष के छोटे भ्राता श्री सुनील कुमार गदिया आज प्रातः पूज्य आचार्यश्री सुनील सागर जी महाराज का पड़गाहन कर रहे थे, अपने निवास स्थान ले जाते वक्त आकस्मिक रूप से मरण को प्राप्त हुए।  ऐसे धर्म निष्ठ सुनील कुमार जी गदिया के देवलोक गमन की घटना के बारे में जिसने सुना, हैरत में आ गया, मन अत्यन्त दुःख से भर उठा। मन मे आहारदान की भावना, गुरुदेव का पड़गाहन, नङ्गे पैर, तन पर धोती दुपट्टा के अलावा कोई अतिरिक्त कपड़े तक नहीं, विशुद्ध भावों से तन का त्याग हो गया। कैसी उच्च गति को प्राप्त किया होगा। धन्य है वह आत्मा। धन्य है। ऐसी भव्य आत्मा को विनम्र श्रद्धांजलि।


■बिन संल्लेखना समाधि मरण जैसे उत्कृष्ट मरण! ऐसी भव्य आत्मा के श्री चरणों में सादर नमन!

बड़ागाँव धसान का महत्वपूर्ण पुरातत्त्व


बड़ागाँव धसान का महत्वपूर्ण पुरातत्त्व


मध्यप्रदेश में टीकमगढ़ जिलान्तर्गत बड़ागाँव क्षेत्र है। यह स्थान धसान नदी के किनारे होने से स्वतंत्र पहचान हेतु इसे बड़ागाँव धसान कहा जाता है। यह क्षेत्र टीकमगढ़-सागर मार्ग पर स्थित है। टीकमगढ़ से 30 कि.मी., शाहगढ़ से 35 कि.मी. पर यह स्थान है। इसके निकटस्थ पुरातात्त्वि क्षेत्र नवागढ़ 10 कि.मी. और द्रौणगिरि क्षेत्र 30 कि.मी. है। यहाँ पुरातात्त्विक महत्व की प्राचीन चौबीसी मूर्तियाँ, त्रिमूर्तिका तीर्थंकर, स्तंभ, तीर्थंकर मस्तक, वितान, प्रस्तर, उपलब्ध हुए हैं।


प्राचीन आदिनाथ चतुर्विंशतिका-







श्रमणशिल्प में चतुर्विंशति मूर्तिशिल्पांकन की समृद्ध परम्परा है। चतुर्विंशतिका अर्थात् एक साथ चौबीस तीर्थंकरों का अंकन। चतुर्विंशतिका प्रतिमाएं धातु एवं पाषाण दोनों पर समान रूप से निर्मित की जाती रहीं हैं। मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जिलान्तर्गत बड़ागांव (धसान) की टेकरी पर अनेक पुरातात्त्विक प्रतिमाओं में यह चतुर्विंशतिका बहुत ही महत्वपूर्ण है। लगभग 50से.मी. की बलुआ पाषाण में निर्मित इस प्रतिमा को मंदिर की मुख्य वेदिका में बायीं ओर स्थापित किया गया है। इसमें मुख्य जिन प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ-ऋषभनाथ हैं। ये कायोत्सर्गस्थ हैं और शेष परिकरस्थ 23 लघु जिन पद्मासनस्थ हैं। 

पादपीठ पर ऋषभनाथ तीर्थंकर का लांछन वृषभ निर्मित है, यह स्पष्ट देखा जा सकता है। वृषभ के दोनों ओर अंजलिबद्ध आराधक युगल है। द्विभंगासन में चॅवरवाहक हैं। मुख्य प्रतिमा का दिगम्बरत्व स्पष्ट है। वक्ष पर श्रीवत्स उत्कीर्णित है। कर्ण स्कंधों को स्पर्श कर रहे हैं, उष्णीष के साथ केश कुंचित हैं तथापि बड़ी-बड़ी केशलटिकाएं स्कंधों पर लटकती हुई कुक्षि तक आई हुईं दर्शाई गई हैं। अशोक वृक्ष की डालियों के कारण भामण्डल स्पष्ट नहीं है। शिरोभाग पर छत्रत्रय निर्मित है, किन्तु वह भग्न है।

परिकर में शेष स्थान में 23 लघु जिन उत्कीर्णित हैं, जो अजितनाथ से महावीर तक संकल्पित किये गये होंगे। ये पद्मासनस्थ लघु जिन मुख्य कायोत्सर्गस्थ प्रतिमा के दोनों पार्श्वों में तथा वितान में संयोजित किये गये हैं। पादपीठ के समानांतर से स्कंधों तक दोनों ओर पांच-पांच तीर्थंकर हैं, उनसे ऊपर दो-दो तीर्थंकर दो पंक्तियों में हैं और वितान में पांच तीर्थंकर शिल्पित किये गये हैं, इस तरह परिकर में 23 तीर्थंकर और आदिनाथ की मुख्य मूर्ति, कुल चौबीस तीर्थंकर हुए। मुख्य प्रतिमा के शिर के दोनों ओर की प्रतिमाओं के सर्पफण दर्शाये गये हैं। इस चौबीसी में मुख्य मूर्ति के दायें ओर की मूर्ति के सप्तफण हैं जो तीर्थंकर पार्श्वनाथ के निर्मित किये जाने की परम्परा रही है और बामपार्श्व की मूर्ति के पंचफण हैं, जो सप्तम तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ के निर्मित किये जाने की परम्परा है। इस तरह यह प्रतिमा बहुत महत्वपूर्ण है। इसका समय 10वीं-11वीं शताब्दी जान पड़ता है।


द्वितीय चतुर्विंशतिका-



यह पाषाण प्रतिमा भग्न है, इसका मस्तक, दक्षिण भुजा और वितान सहित स्कन्धों के समानान्तर का परिकर भग्न-अनुपलब्ध है। यहां प्राप्त भग्न प्रतिमा-मस्तकों में से एक मस्तक हमने प्रस्तुत द्वितीय चतुर्विंशतिका पर लगाकर चित्र को आंशिक पूर्णता दी है। इस तरह की पूर्ण चतुर्विंशतिका प्रतिमाएँ देवगढ़, गंधर्वपुरी आदि कई स्थानों पर संरक्षित हैं। इसके पादपीठ पर चिह्न तो दृष्टिगत नहीं हो रहा है, किन्तु अनुकूलाभिमुख दो सिंह हैं। अधिकांश प्रतिमाओं में पादपीठ में सिंहासन के सिंह दर्शाये जाते हैं, किन्तु तीर्थंकर लांछन अलग से प्रदर्शित किया जाता है। चॅवरधारियों के समानान्तर में यक्ष-यक्षी का अंकन है, किन्तु क्षरित व कुछ खण्डित होने के कारण इनके आयुध आदि देखकर स्पष्टतः पहचान नहीं हो पा रही है। इसके चॅवरवाहक स्पष्ट हैं। मुख्य प्रतिमा के बामपार्श्व में यक्षी के ऊपर से उपरिम बढ़ते क्रम में उदर-स्थान तक दो दो के चार युग्म लघु जिन शिल्पित हैं। ये पद्मासन में हैं। दक्षिण पार्श्व में अधिक भग्न होने से एक एकल और एक युग्म ही अवशेष हैं। किन्तु यह चतुर्विंशतिका ही रही होगी। 


त्रितीर्थी तीर्थंकर प्रतिमा-





यह शिलाखण्ड तो पूर्ण है किन्तु प्रतिमा और परिकरांकित आकृतियों को बहुत क्षतिग्रस्त किया गया है। इस प्रतिमा को देखकर प्रतीत होता है कि यह बहुत सुन्दर और सौम्य प्रतिमा रही होगी। पद्मासन में मुख्य प्रतिमा है और परिकर में दो अन्य लघु जिन प्रतिमाएं हैं, इस कारण यह त्रितीर्थी प्रतिमा कही जा सकती है। इसके सिंहासन के मध्य में चक्र, उसके दोनों ओर विरुद्धाभिमुख दो सिंह और उन्हीं के समानान्तर में बायें तरफ यक्षी व दाहिनी ओर यक्ष निर्मित है। यक्षी की गोद में बालक बैठा सा प्रतीत हो रहा है, जिससे उसे अम्बिका अनुमानित किया जा सकता है। इस सिंहासन पर दोनों ओर चामरधारी द्विभंगासन में अवस्थित हैं, मध्य में कलात्मक चरण चौकी है, जिस पर मुख तीर्थंकर पद्मासन में आसीन दर्शाये गये हैं। मुखमण्डल की भूमिका में अण्डाकार का सुन्दर प्रभामण्डल है। इसके केशविन्यास स्वाभाविकता लिये हुए बहुत सुन्दर और अन्यत्र के शिल्पांकनों से हटकर विशेषता युक्त शिल्पित हैं। केश ऊपर को संवारे गये, उन्हीं के जूड़े से बड़ा सा उष्णीष बनाय हुआ प्रतीत होता है। कर्णों के पीछे से आकर सुन्दर केशलटों के गुच्छक स्कंधों पर लंबित हैं। मुख्य प्रतिमा के मस्तक के दोनों ओर एक-एक पद्मासन जिन हैं। इनकी विशेषता भी ध्यान देने योग्य है। इनका आसन कलात्मक और चन्द्र आकार का दृष्टिगत है। केश विन्यास मुख्य प्रतिमा के समान है। प्रायः लघुजिन के भी चॅवरधारी दर्शाये जाते हैं, नहीं भी दर्शाये जाते हैं किन्तु यहां ध्यान देने योग्य है कि इन दोनों लघु जिनों के दोनों ओर चॅवरधारियों के स्थान पर दो दो महिलाएँ निर्मित हैं और उनके हाथों में पुष्पगुच्छ या कलश जैसी कोई वस्तु है। प्रायः तीर्थंकर के पार्श्वों में निर्मित आकृतियों का मुख उन्हीं की ओर होता है, किन्तु इनके पार्श्वों की एक एक स्त्रीपात्र का पृष्ठ भाग इनकी ओर है।येे मुख्य प्रतिमा के मस्तक की ओर अभिमुख दर्शाईं गई हैं। 

इस प्रतिमा के तीन छत्र स्पष्ट हैं, उनके ऊपर दुंदुभिवादक भी निर्मित है। त्रिछत्र के दोनों ओर पुष्पवर्षक या माल्यधारी देवयुगल हैं जो भग्न है, किन्तु उनके कुछ कुछ अवशेष दृष्टिगत हैं। इस प्रतिमा का जटाजूट और स्कंधों तक केशलटों के दर्शाये जाने से यह प्रतिमा प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की निश्चित होती है, किन्तु पादपीठ में निर्मित यक्षी यदि अम्बिका है तो इसे बाईसवें तीर्थंकर नेमिनाथ की प्रतिमा माना जायगा।


मानस्तंभ या स्तंभ-




यहां एक पाषाण का प्राचीन मानस्तंभ या स्तंभ प्राप्त हुआ है। इस तरह के स्तंभ निकटस्थ पुरातात्त्विक तीर्थ नवागढ़ में भी प्राप्त हुए हैं। इस स्तंभ के अधोभाग में सरस्वती या शासन देवी उत्कीर्णित है, जिसके एक हाथ में कमण्डलु है। स्तंभ के मध्य में उपदेशक और ऊपर तीर्थंकर प्रतिमा उत्कीर्णित है। स्तंभ में तीन ओर तो तीर्थंकर प्रतिमाएं हैं, किंतु स्तंभ मंदिर की दीवाल से टिका होने और समयाभाव के कारण हम इसे पलटवा कर नहीं देख पाये थे कि इसकी चतुर्थ दिशा में प्रतिमा है या नहीं। हो सकता है इस स्तंभ पर शिलालेख भी हो।


ब्राह्मी अभिलेख एवं चरणचिह्न- 



बड़ागांव (धसान) क्षेत्र का सर्वेक्षण हमने सन् 2016 में किया था। यहां  की टेकरी पर सबसे ऊपर अन्त में एक देवकुलिका में चबूतरा पर चरण चिह्न स्थापित हैं। उस चबूतरे में एक शिलापट्ट लगा हुआ है जो बहुत महत्वपूर्ण है। तीन पंक्तियों का यह शिलालेख ब्राह्मी लिपी में है। इस शिलालेख का वाचन करने में हम सफल रहे। जो चित्र में दिया जा रहा है। इसका वाचन  देवनागरी में इस तरह है-

1. फलहोडी ग्राम आहुट कोटि सिद्धासि

2. नमस्कार मांझा

3. -भट्टार गुणकीर्ति

इसकी भाषा मराठी है, यह प्राकृत णिव्वाणभक्ति की पंक्ति-‘‘फलहोडी गामे आहुट्ठयकोडीओ णिव्वाण गआ णमो तेसिं’’ का मराठी अनुवाद है। 

उक्त पुरातत्त्व के अतिरिक्त बड़ागांव (धसान) में प्राचीन तीर्थंकर, तीर्थंकर-मस्तक, वितान, प्रस्तर, स्तंभ आदि तीस-पैतीस पुरावशेष उपलब्ध हैं, जो बड़ागांव (धसान) सिद्ध क्षेत्र, अतिशय क्षेत्र के महत्व और इसकी प्राचीनता को प्रमाणित करते हैं।


-डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’

22/2, रामगंज, जिन्सी, 

इन्दौर, मो. 9826091247

आज की कहानी एक चुटकी ईमानदारी






आज की कहानी

एक चुटकी ईमानदारी


रामू काका अपनी ईमानदारी और नेक स्वाभाव के लिए पूरे गाँव में प्रसिद्द थे। एक बार उन्होंने अपने कुछ मित्रों को खाने पर आमंत्रित किया। वे अक्सर इस तरह इकठ्ठा हुआ करते और साथ मिलकर अपनी पसंद का भोजन बनाते। आज भी सभी मित्र बड़े उत्साह से एक दुसरे से मिले और बातों का दौर चलने लगा। जब बात खाने को लेकर शुरू हुई तभी काका को एहसास हुआ कि नमक तो सुबह ही ख़त्म हो गया था। काका नमक लाने के लिए उठे फिर कुछ सोच कर अपने बेटे को

 बुलाया और हाथ में कुछ पैसे रखते हुए बोले, “ बेटा, जा जरा बाज़ार से एक पुड़िया नमक लेता आ..”


“जी पिताजी।”, बेटा बोला और आगे बढ़ने लगा।


“सुन”, काका बोले, “ ये ध्यान रखना कि नमक सही दाम पे खरीदना, ना अधिक पैसे देना और ना कम।”


बेटे को आश्चर्य हुआ, उसने पूछा, “पिताजी,


 अधिक दाम में ना लाना तो समझ में आता है, लेकिन अगर कुह मोल भाव करके मैं कम पैसे में नामक लाता हूँ और चार पैसे बचाता हूँ तो इसमें हर्ज़ ही क्या है?”…


“नहीं बेटा,” काका बोले, “ ऐसा करना हमारे गाँव को बर्वाद कर सकता है! जा उचित दाम पे नामक लेकर आ।” काका के मित्र भी ये सारी बात सुन रहे थे, किसी ने बोला,

 “ भाई, तेरी ये बात समझ ना आई, कम दाम पे नमक लेने से अपना गाँव कैसे बर्वाद हो जाएगा?”,


काका बोले, “ सोचो कोई नमक कम दाम पे क्यों बेचेगा, तभी न जब उसे पैसों की सख्त ज़रूरत हो। और जो कोई भी उसकी इस स्थिति का फायदा उठाता है वो उस मजदूर का अपमान करता है जिसने पसीना बहा कर..कड़ी मेहनत से नमक बनाया होगा”


“लेकिन इतनी सी बात से अपना गाँव कैसे बर्वाद हो जाएगा?”, मित्रों ने हँसते हुए कहा।


“शुरू में समाज के अन्दर कोई बेईमानी नहीं थी, लेकिन धीरे-धीरे हम लोग इसमें एक-एक चुटकी बेईमानी डालते गए और सोचा कि इतने से क्या होगा, पर खुद ही देख लो हम कहाँ पहुँच गए हैं… आज हम एक चुटकी ईमानदारी के लिए तरस रहे हैं!”


हमें छोटे-छोटे मसलों में भी पूरी तरह ईमानदार होने की सीख देती है और हमें दूसरों के प्रति संवेदनशील होना सिखाती है।


अपने दिन प्रतिदिन के जीवन में हम बहुत बार ऐसा व्यवहार करते हैं जो हम भी अन्दर से जानते हैं कि वो गलत है। पर फिर हम ये सोच कर कि “इससे क्या होगा!”, अपने आप को समझा लेते हैं और गलत काम कर बैठते हैं और इस तरह समाज में अपने हिस्से की बेईमानी डाल देते हैं। चलिए, हम सब प्रयास करें कि ईमानदारी की बड़ी-बड़ी मिसाल कायम करने से पहले अपनी रोज-मर्रा की ज़िन्दगी में ईमानदारी घोलें और एक चुटकी बेईमानी को एक चुटकी ईमानदारी से ख़त्म करें..!


संकलन कर्ता

.............एक चुटकी ईमानदारी से तात्पर्य मात्र  यह है कि अपने हाथों से या सहयोग से कही कोई ऐसा कार्य ना हो जिससे गलत संदेश या शिक्षा किसी को भी मिले हमारा हर कार्य ऐसा होना चाहिए जिसमें संसार के सभी जीवों के सहयोग एवं सुरक्षा की भावना की ही मुख्यता हो हमारे सच्चे देव शास्त्र गुरु भी हमें ऐसी ही भावना से मोक्षमार्ग में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते है अब हम सब भी स्व-पर के हित की भावना से निर्दोष जिनशासन की प्रभावना करते हुए परंपरा से निर्वाण को प्राप्त करें और सच्चे सुखी हों।


जय जिनेन्द्र 

जैन संस्कृति शोध संस्थान, इन्दौर में रामलला की छवि पर सूर्य तिलक






जैन संस्कृति शोध संस्थान, इन्दौर में रामलला की छवि पर सूर्य तिलक



इन्दौर। जैन संस्कृति शोध संस्थान, इन्दौर में आज 17 अप्रैल को 12.15 बजे रामलला की छवि पर सूर्य तिलक का दृष्य प्रस्तुत किया गया। अनुष्का जैन द्वारा मूर्तिप्रतिष्ठाा के दिन बनाई गई रामलला की छवि पर यह दृष्य प्रस्तुत किया गया। सूर्य की किरणें परावर्तित कर रामलला की छवि के मस्तक पर सूर्य की किरणें इस प्रकार से बिम्बित हो रहीं थी मानों उनसे तिलक किया जा रहा हो। यह दृश्य बहुत ही मनोरम था। दृश्य देखने के लिए भारी हुजूम उमड़ पड़ा।





-डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’

22/2, रामगंज, जिंसी, इन्दौर

मो. 9826091247

गन्धर्वपुरी की द्वितीर्थी महत्वपूर्ण तीन प्रतिमाएँ

  




गन्धर्वपुरी की द्वितीर्थी महत्वपूर्ण तीन प्रतिमाएँ

- डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’, इन्दौर

द्वितीर्थी या द्विमूर्तिका से आशय है एक ही शिलाफलक में दो समान आकर की मूर्तियाँ। सबसे सुन्दर द्विमूर्तिका तीर्थंकर  प्रतिमा खण्डगिरि की गुफा से मिली है और संप्रति लन्दन (९९) में सुरक्षित है। जिनों की पीठिका पर ऋषभ और सिंह लांछन उत्कीर्ण है। इस प्रकार यह ऋषभ और महावीर की द्वितीर्थी मूर्ति है। ऋषभ जटामुकुट से शोभित है पर महावीर के केशों की रचना गुच्छकों (कुंचित केश) के रूप प्रदर्शित है। खजुराहो और देवगढ़ में भी कुछ द्वितीर्थी प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं। शिवपुरी संग्रहालय में एक द्वितीर्थी प्रतिमा प्रदर्शित है। रायपुर म्यूजियम में एक द्वितीर्थी प्रतिमा प्रदर्शित है जो जो तीर्थंकर अजितनाथ और संभवनाथ की प्रतिमाएँ हैं। एक द्वितीर्थी प्रतिमा प्रिंस ऑफ बेल्स संग्रहालय में संरक्षित है, जिसमें एक प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ और द्वितीय चौबीसवें तीर्थंकर महावीर की प्रतिमा है। ऐसीं द्वितीर्थी जिन मूर्तियों के किसी प्रकार के उल्लेख प्रतिमाशास्त्रों में मूर्तिनिर्माण संबंधी जैन ग्रन्थों में नहीं मिले हैं। इन मूर्तियों का निर्माण नवी से बारहवीं शती ई. के मध्य हुआ माना जाता है। तीन द्विमूर्तिका प्रतिमाएँ गन्धर्वपुरी (देवास) म. प्र. के स्थानीय राजकीय संग्रहालय में संग्रहीत है। ये प्रतिमाएँ अन्यत्र से भिन्न व अनूठी हैं।

प्रथम द्विमूर्तिका प्रतिमा-




दो तीर्थंकर प्रतिमाएँ एक बलुआ पत्थर के शिलाखण्ड में निर्मित हैं। ये समपादासन में कायोत्सर्गासनस्थ हैं। पूर्ण पादपीठ अदृष्ट होने से लांछन या शासनदेव-देवी की जानकारी नहीं हो पाती है, इस कारण ये किन तीर्थंकरों की मूर्तियां हैं, यह निर्णीत नहीं हो पाता है। दोनों प्रतिमाओं के अलग-अलग चॅवरवाहक हैं। एक प्रतिमा के चॅवरी के चॅवर ढुराने वाले हाथ ऊपर की ओर हैं तो दूसरी प्रतिमा के चॅवरवाहकों ने चॅवर ढुराते हुए हाथों को वक्ष के पास किया हुआ है। इन तीर्थंकर प्रतिमाओं की हथेलियों पर चक्र उत्कीर्णित हैं। पाषाण क्षरित हो जाने से श्रीवत्स चिह्न के मात्र निशान रह गये हैं। कुंचित केश, उष्णीस और प्रभावल दोनों के समान हैं। इसका वितान महत्वपूर्ण था जो खण्डित हो गया है। किन्तु शीर्ष पर एक पद्मासन लघुजिन और उनके दोनों ओर एक-एक कायोत्सर्ग लघु जिन मूर्तियां दृष्ट हैं।

द्वितीय द्विमूर्तिका प्रतिमा-




यह द्विमूर्तिका भी सपरिकर है। घुटनों से नीचे का भाग खण्डित और अप्राप्त होने पर भी मध्य, और ऊर्ध्व भाग का परिकर देखा जा सकता है। इस द्विमूर्तिका के तीर्थंकरों के बाह्य भाग के किनारों पर तीन-तीन पद्मासनस्थ लघुजिन प्रतिमायें उत्कीर्णित हैं। भग्न भाग में लघु जिन प्रतिमाएं कितनी रहीं होंगी, कहा नहीं जा सकता। चॅवरधारी, माल्यवाहक-युगल, प्रभावल, उष्णीष, छत्रत्रय, मृदंगवादक देव और छत्रत्रय के दोनों ओर गजलक्ष्मी के हाथी दर्शाये गये हैं। ये परिकर दोनों प्रतिमाओं के अलग-अलग हैं। इनमें यह विशेषता है कि दोनों के केश कुण्डल्याकार में स्कंधों पर लटकते हुए दर्शाये गये हैं। प्रायः ऋषभनाथ की प्रतिमाओं में स्कंधों पर केश-लटिकाएँ दर्शाने की परम्परा रही है, किन्तु अन्य तीर्थंकरों के स्कंधों पर केश-लटें दर्शाये जाने के भी अनेकों उदाहरण हैं। इसलिए इन्हें केवल स्कंधावलम्बित केश-लटिकाओं के आधार पर ऋषभदेव की प्रतिमाएं घोषित नहीं किया जा सकता। सम्भावना यह है कि दोनों प्रतिमाएँ भिन्न-भिन्न तीर्थंकरों की होंगी।

तृतीय द्विमूर्तिका प्रतिमा-




यह द्विमूर्तिका संभवतः लाने में खण्डित हो गई होगी, क्योंकि इसके अन्य खण्डित स्थानों की अपेक्षा शिला के दो भागों में टूटने के निशान अपेक्षाकृत नवीन हैं। गंधर्वपुरी के स्थानीय राजकीय संग्रहालय में इसके दोनों भाग पास-पास में रखे गये हैं। चित्र में हमने दनों भागों को मिलाकर एक दर्शाया है। इस द्विमूर्तिका का सबसे ऊपर का शिलाखण्ड खण्डित और अप्राप्त है। इस द्विमूर्तिका में भी चॅवरधारी, माल्यवाहक, छत्रत्रय, मृदंगवादक एकल - एकल देव और छत्रत्रय के दोनों ओर गजलक्ष्मी के गज सामान्य रूप से उत्कीर्णित हैं। इसमें विशेषता है कि दोनों प्रतिमाओं के किनारे की ओर के हाथ की कुहनी की बराबरी पर एक एक अंजलिबद्ध आराधक है और दोनों मुख्य प्रतिमाओं के मध्य एक कायोत्सर्ग लघु जिन उत्कीर्णित हैं।

गंधर्वपुरी की उपरोक्त तीनों द्वितीर्थी मूर्तियों में दो समान बड़ी मूर्तियों के अतिरिक्त कोई समानता नहीं है। प्रथम में वितान में तीन या अधिक लघु जिन उत्कीर्णित हैं। द्वितीय में बाह्य पार्श्व में तीन-तीन या अधिक लघु जिन आमूर्तित हैं और तृतीय द्वितीर्थी में दोनों के मध्य एक लघुजिन उर्त्कीिर्णत किये गये हैं। अष्टप्रातिहार्यों का यथासक्य सभी में समावेश किया गया है।

इस तरह गंधर्वपुरी की तीनों द्विमूर्तिका प्रतिमाएँ भिन्न-भिन्न व अनूठी हैं। ये बलुआ पाषाण में निर्मित हैं। इनका समय 12वीं - 13वीं शती ईस्वी अनुमानित किया गया है।

डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’
22/2, रामगंज, जिंसी, इन्दौर मो. 9826091247
mkjainmanuj@yahoo.com

अन्तर्मना आचार्य श्री108 प्रसन्न सागर जी मुनिराज का 35 दिनों में 650 किलोमीटर कि पद यात्रा कर श्रवणबेलगोला में भब्य मंगल प्रवेश हुवा।








अन्तर्मना आचार्य श्री108 प्रसन्न सागर जी मुनिराज का 35 दिनों में 650 किलोमीटर कि पद यात्रा कर श्रवणबेलगोला में भब्य मंगल प्रवेश हुवा।


इस सदी के सबसे कम उम्र के तपस्वी ,मौन साधक सम्मेद शिखर में पारसनाथ टोंक पर साधना करने वाले एवं परम पूज्य तपस्वी सम्राट आचार्य श्री 108 सन्मति सागर जी महाराज से आशीर्वाद प्राप्त एवं इस सदी के महान संत संत शिरोमणि गुरुवर आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज से सिंह निष्क्रिय व्रत धारण करने वाले परम पूज्य प्रातः स्मरणीय अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज का मंगल साधना स्वर्णभद्र टोंक पर 2022 में समपन्न करने के बाद वहाँ से 2000 किलोमीटर का मंगल विहार कर तपस्वी सम्राट के समाधी स्थल कुंजवन में 2023 का चातुर्मास में धर्म की डंका बजाकर 7 मार्च 2024 को मंगल विहार कर 35 दिन में इस विषम गर्मी में 651 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर आज विश्व की सबसे बड़ी प्रतिमा गोमटेश्वर बाहुबली भगवान का दर्शन किया ओर प्रतिदिन के अपनी तप और सामयिक गोमटेश्वर बाहुबली भगवान के चरणों मे विषम गर्मी में किया। इस अवसर पर अन्तर्मना ने आज श्रवण बेलगोला के बिघ्नश्री पर्वत पर आज के दिन 1044 वर्ष पूर्व भगवान बाहुबली की प्रतिमा का स्थापना हुवा था जिनका भी दर्शन किया इस अवसर पर अन्तर्मना ने अपनी उवाच में कहा कि 

जीते जी रिश्तों में आग और मरने के बाद आग, अपने ही लगाते हैं..

इसलिए जीते जी जलना छोड़ दो, अन्यथः अपने ही जलायेंगे..!

जैसा तुम जीना चाहते हो, वैसा ही सब जीना चाहते हैं।

जैसे तुम सुख पाना चाहते हो, वैसे ही सब सुख पाना चाहते हैं।

जो तुम अपने लिए और अपने परिवार के लिए चाहते हो, वो तुम सबके लिए चाहो।

यदि आप नहीं चाहते हैं कि कोई मेरा बुरा करे, नुकसान करे, अपमान करे, तो आप भी दूसरों के प्रति ऐसा ना करें, और

जो आप अपने प्रति चाहते हैं कि सब मेरे प्रति प्रेम, सम्मान, सुख, शान्ति, आनंद का व्यवहार करे, तो आप भी आज से ऐसा जीना शुरू कर दें।

जो आप अपने प्रति चाहते हैं, वैसा दूसरों के प्रति व्यवहार करना शुरू कर दें,,

क्योंकि जो जीने की चाह आपके भीतर छुपी है,, वैसी चाह पड़ोसी के भीतर भी छुपी है।

जो सम्वेदना आपके भीतर है, वैसी सम्वेदना दूसरों के पास भी जीने की है।

दोनों की सम्वेदनाओं का विस्तार एक ही है अच्छे पन से जीने का।

कहने का अर्थ है - मेरे भीतर और आपके भीतर जो चेतना है, वह एक ही चेतना का फैलाव है। जैसा कर्म करेगा वैसा फल देगा भगवान. इसके पश्चात सभी मंदिर का दर्शन कर रात्रि विश्राम श्रवणबेलगोला में हुवा।



कोडरमा मीडिया प्रभारी जैन राज कुमार अजमेरा,मनीष सेठी 

आर्यिका 105 विमलश्री माताजी ससंघ 9 पिच्छी मंगल पद विहार अपडेट




आर्यिका 105 विमलश्री माताजी ससंघ 9 पिच्छी मंगल पद विहार अपडेट

*13 अप्रैल 2024*
🥁🥁🥁🥁🥁🥁🥁🥁
प.पू.उच्चारणाचार्य 108 श्री विनम्रसागर जी महामुनिराज भक्तामर वाले बाबा के परम शिष्या आर्यिका 105 विमलश्री माताजी ससंघ *9 पिच्छी सहित का सागर से भोपाल* के लिए चल रहा है मंगल पद विहार।
*आज 13 अप्रैल 2024* आज की आहारचर्या श्री 1008 पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर राहतगढ़ जिला सागर में होगा।
--------------------------------
शंकर भैया विनम्र देशना परिवार-
7999877637-7222936873

मुनि श्री अक्षय सागर , मुनि श्री विमल सागर , मुनि श्री निरंजन सागर का संघ सहित कुण्डलपुर में हुआ शुभागमन






मुनि श्री अक्षय सागर , मुनि श्री विमल सागर , मुनि श्री निरंजन सागर का संघ सहित कुण्डलपुर में हुआ शुभागमन


कुण्डलपुर  ।   सुप्रसिद्ध जैन तीर्थ कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य मुनि श्री अक्षयसागर जी महाराज ,मुनि श्री विमल सागर जी महाराज ,मुनिश्री अनंत सागर जी महाराज ,मुनिश्री अरहसागर जी महाराज, मुनि श्री दुर्लभ सागर जी महाराज, मुनि श्री संथान सागर जी महाराज, ऐलक श्री उपशमसागर जी महाराज पटेरा दमोह की ओर से एवं मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज कुम्हारी की ओर से भव्य मंगल प्रवेश किया। 

    मीडिया समिति के राजेश जैन रागी तथा जयकुमार जलज ने बताया कि इस अवसर पर बड़ी संख्या में जन समूह के बीच मुनि संघ की भव्य अगवानी की गई ।अगवानी में बड़ी संख्या में क्षुल्लक जी, ब्रह्मचारी भैया ,दीदी जी, कुंडलपुर क्षेत्र कमेटी पदाधिकारी सदस्य, महोत्सव समिति पदाधिकारी ,प्रभारी ,सदस्य, कुंडलपुर जैन समाज की उपस्थिति रही । मुनि संघ भव्य मंच पर विराजमान सभी निर्यापक संघ ,मुनि संघ आर्यिका संघ के बीच वात्सल्य मंगल मिलन हुआ । मुनि संघ क्षुल्लक  संघ ने सभी निर्यापक संघ की त्रय परिक्रमा लगाई और वंदना की। अगवानी में शामिल सभी दिव्य घोष की मंगल ध्वनि से पूरा क्षेत्र गुंजायमान  हो रहा था ।


🙏 वरिष्ठ पत्रकार राजेश जैन रागी, रत्नेश जैन बकस्वाहा

जिनशासन में प्रदर्शन का महत्व नहीं जिनशासन में दर्शन और अंतरदर्शन का महत्व है - श्री समता सागर जी महाराज







जिनशासन में प्रदर्शन का महत्व नहीं जिनशासन में दर्शन और अंतरदर्शन का महत्व है  -      श्री समता सागर जी महाराज


कुण्डलपुर ।  दमोह जिले का सुप्रसिद्ध जैन तीर्थ कुंडलपुर में निर्यापक श्रमण मुनि श्री समता सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा यह बात सच है कि मैं अपने जेष्ठ श्रेष्ठ के प्रवचन सुनने के लिए यहां उपस्थित कल भी हुआ था आज भी हुआ। लेकिन पूज्यवर का आदेश टालने की कोशिश भी की लेकिन टाल नहीं पाया ।गुरुवर आचार्य श्री ने मूकमाटी में लिखा है बड़ों के आदेश को टालना नहीं पड़ता बल्कि पालना पड़ता है ।पूत के लक्षण पालने में दिखाई देते हैं। हम जिस उद्देश्य से सभी यहां उपस्थित हैं हमारे निर्यापक श्रमण के लक्षण बचपन से उस तरह दिखाई दे रहे हैं, जो आज 55 की उम्र में भी हम सबको एहसास हो रहा है। मैंने एक जगह पढ़ा था अगर कहीं कोई ऊंचा पहाड़ पर्वत हो तो यह निश्चित मानकर चलिए आसपास गहरी नदी जरूर होगी ।क्योंकि गहराई को पाये बगैर कभी कोई ऊंचाई को प्राप्त नहीं कर सकता। कुंडलपुर के बड़े बाबा ऊंचाई पर विराजमान है आद्य शासन नायक हैं उनका सर्वोदयी शासन जो चल रहा है ऊंचाई से चल रहा है। लेकिन उस ऊंचाई का परिचय वर्धमान सागर की गहराई से भी हमें मिल रहा है ।आद्य तीर्थंकर भगवंत और उनका जिन शासन गणधरों और आचार्यों की परंपरा से यहां तक आया है । आचार्यों जिन शासनोन्नतिकरा आचार्य वह होते हैं जिन शासन की उन्नति को करते हैं जिन शासन के विस्तार को करते हैं। आचार्य प्रवर को जो विरासत मिली थी अपने गुरुवर ज्ञान सागर महाराज से आचार्य श्री ने उस विरासत का विस्तार किया और अपने कठिन परिश्रम से कठोर साधना से अपनी निस्पृहता से निराभिमानता से उन्होंने जो विरासत में खोज मिली थी उसे समुद्र सागर बनाकर दिखा दिया है ।आज हम सबके बीच में हमारे गुरुवर नहीं है ।देह का परिवर्तन हुआ पर्याय का परिवर्तन हुआ। प्रकृति का नियम है हम और आप उसे चाहे उसे टाल नहीं सकते।लेकिन उन्होंने जो संघ की संयोजना की है संघ का संवर्धन किया है वह विरासत उस रूप में बल्कि उससे ज्यादा विस्तार पाकर यावतचंद्र दिवाकर बढ़ती रहेगी ।जैन शासन का रथ कभी रुकता नहीं है एक सारथी कहीं बदलता है तो दूसरा सारथी उस रथ को आगे बढ़ाता है ।हम सब का सहयोग अपने योग्यतम सारथी के लिए है ।पूर्ण निष्ठा पूरी ईमानदारी से पूरे संघ का है। हम सबके सर्वोच्च सारथी निर्यापक श्रमण मुनि श्री समय सागर जी हैं। सारी समाज सारा देश इस भावना से ओतप्रोत है ।गहराई को पाये बगैर कोई भी ऊंचाई दिखाऊ तो हो सकती है लेकिन टिकाऊ नहीं हो सकती ।हमारे गुरुवर ने यह सिखाया है कि हमें कोई भी कार्य दिखाऊ नहीं करना है टिकाऊ करना है ।बड़े-बड़े झाड़ गगनचुंबी जिनालय भव्यतम मंदिर जितने जितने ऊंचे दिखाई देते इतने उन्हें मजबूत बनाने के लिए नींव की गहराई की जाती है जब बड़े बाबा का मंदिर बन रहा था बनने का प्लान चल रहा था आचार्य श्री ने सभी को यही निर्देश दिया था ऊंचाई के अनुपात से अंदर पहाड़ी में नींव के रूप में गहराई में बहुत ज्यादा मजबूती तैयार करना चाहिए और आज बड़े बाबा का भव्यतम मंदिर आज सबको दिखाई दे रहा है ।सारांश यह है कि जिन शासन में दिखाने का महत्व नहीं है जिन शासन में प्रदर्शन का महत्व नहीं है जिन शासन में दर्शन और अंतरदर्शन का महत्व है ।पूत के लक्षण पालने में दिखाई देते हैंमूक माटी में गुरुवर ने दो अर्थ निकाले लौकिक एक छोटा सा बच्चा जाता है पालने में पड़ा रहता है तो पालने में उसकी एक्टिविटी गतिविधि देखकर यह अंदाज लगा लिया जाता है कि बच्चा किस स्वभाव का है पूत के लक्षण पालने में दिखाई देते यह भविष्य में क्या करेगा और फिर गुरुवर ने नया दिया सभी को पूत का लक्षण पालने में है और छोटे से शिशु या शिष्य का लक्षण वहीं से दिखाई देने लगता है कि वह गुरु की आज्ञा को कितना पाल रहा है आज्ञा पालन के रूप में जो अर्थ दिया गया वह परमार्थ का अर्थ है हम सभी का अर्थ है जैसे गुरु का स्मरण आप सबको होता है हमें भी बार-बार होता है ।उन क्षणों को कभी भूला नहीं जाता। जिन क्षणों को गुरुवर अपनी सर्वोत्कृष्ट साधना में थे उन क्षणों को जिन क्षणों में प्रतिकूलता होने पर भी समता का भाव उनके चेहरे पर दिखाई दे रहा था ।हमारे योग्य जेष्ठ श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि योग सागर जी महाराज इसके साक्षी रहे हैं मैं स्वयं साक्षी रहा हूं ,प्रसाद सागर महाराज साक्षी रहे हैं, साथ रहने वाले चंद्रप्रभ सागर महाराज ,निरामय सागर ,पूज्यसागर, महासागर आदि महाराज इसके साक्षी रहे हैं। उन क्षणों में मन अधीर हो गया था हृदय कांप रहा था क्योंकि सारी स्थितियां समझ में आने लगी थी। योगसागर जी महाराज ने संकेत किया कहीं किसी को रोना नहीं आखिरी समय समाधि का धैर्य रखो,अपने सभी भावों को संभालकर सभी महाराज जी गुरुवर को क्या संबोधित करेंगे बल्कि एक छोटा बेटा पिता का जो भाव होता कर सकता है वह सभी हम शिष्यों ने किया। हम सब की परम चैतन्यता को लेकर रही है उसके अनेक स्मरण चंद्रगिरी डोंगरगढ़ में मैंने सुनाएं थे। आज भी वह संदर्भ हमारे मानस में घूमते रहते हैं ।ऐसे गुरुवर के प्रति जो प्राणपण से कर्तव्य बना वह किया आप सभी हृदय से जुड़े रहे उस समय तक बड़ा धैर्य रखा जिस समय जेष्ठ श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण समयसागर जी का आगमन हुआ ।मुनिवर ने समाधि स्थल की वंदना की भक्ति पाठ संपन्न किया और हम सभी महाराज ,महाराज जी को लेकर आए तब तक बड़ा धैर्य रखा ।जब महाराज जी जाकर के कक्ष में विराजमान हुए और मैंने अपने पूज्यवर के चरणों में माथा रखा मेरी आंखों से आंसुओं की धार वह निकली क्योंकि अब हमारे लिए एक ही तो सहारा है संसार सागर से पार होने यही तो एक किनारा है। मुनि ने बड़ा धैर्य बंधाया और उस समय सारी परिस्थितियां मुनिवर के सामने रखी। 


🙏 वरिष्ठ पत्रकार राजेश जैन रागी/रत्नेश जैन बकस्वाहा

श्रमणाचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज (24 पिच्छी) ससंघ तिजारा की ओर

 













श्रमणाचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज (24 पिच्छी) ससंघ तिजारा की ओर


भावलिंगी संत विहार अपडेट

(अतिशय क्षेत्र ‘आदीश्वर धाम’ जतारा से तिजारा जी तीर्थ वंदनार्थ)


परम पूज्य ‘जीवन है पानी की बूँद’ महाकाव्य के मूल रचयिता ष्विमर्श लिपिष् के सज्रेता जिनागम पंथ प्रवर्तक, भावलिंगी संत, श्रमणाचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज (24 पिच्छी) ससंघ 


भावलिंगी संत विहार अपडेट

एटा से अतिशय क्षेत्र तिजारा जी

       


अभी अभी डीग जैन मंदिर से हुआ विहार


12 अप्रैल,2024 ( रात्रि विश्राम)

 स्वतंत्रता सेनानी श्री राम सिंह राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय परमदरा डीग


13 अप्रैल 2024, (आहारचर्या)

ज्ञान ज्योति पब्लिक स्कूल, इंद्रौली कामां डीग (राज.)

धर्म जागृति संस्थान का सप्तम राष्ट्रीय अधिवेशन अतिशय क्षेत्र तिजारा में 15 अप्रैल को आचार्य श्री वसुनंदी महराज ससंघ सानिध्य में होगा भव्य आयोजन








 धर्म जागृति संस्थान का सप्तम राष्ट्रीय अधिवेशन अतिशय क्षेत्र तिजारा में 15 अप्रैल को आचार्य श्री वसुनंदी महराज ससंघ सानिध्य में होगा भव्य आयोजन


  तिजारा | अखिल भारतवर्षीय धर्म जागृति संस्थान का सप्तम राष्ट्रीय अधिवेशन श्री चंद्र प्रभु अतिशय क्षेत्र देहरा तिजारा के  प्रांगण में स्थित चन्द्रगिरि  वाटिका में परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी महामुनिराज ससंघ के सानिध्य में सोमवार 15 अप्रैल को आयोजित होगा। 


धर्म जागृति संस्थान के राष्ट्रीय महामंत्री इंजीनियर भूपेंद्र जैन दिल्ली ने बताया कि धर्म सिखाओ धर्म बचाओ नारे को आगे लेकर चल रही धर्म जागृति संस्थान की सभी राष्ट्रीय शाखाओं का सामूहिक राष्ट्रीय अधिवेशन अतिशय क्षेत्र देहरा तिजारा में आयोजित होने जा रहा है।जिसमें वर्ष पर्यंत किए गए सामाजिक सेवा कार्य के लिए उत्कृष्ट शाखाओं के साथ-साथ कार्यकर्ताओं व पदाधिकारीओं का सम्मान भी राष्ट्रीय कार्यकारिणी के द्वारा किया जाएगा। अधिवेशन प्रातः 9 बजे से दो सत्रों में आयोजित होगा तो वही प्रथम सत्र में आचार्य श्री के उद्धबोधन के साथ साथ खुला सत्र भी आयोजित किया जाएगा जिसमे धर्म जागृति संस्थान की प्रगति हेतु अपने विचार रखने की स्वतंत्रता होगी।


अधिवेशन संयोजक सुरेश जैन गौतमनगर के अनुसार द्वितीय सत्र में सम्मान समारोह के साथ समापन होगा जिसमें कार्यकर्ताओं व पदाधिकारियो को सम्मानित किया जाएगा। राष्ट्रीय प्रचार मंत्री संजय जैन बड़जात्या कामां ने सभी से अधिक से अधिक संख्या में अधिवेशन में भाग लेने की अपील करते हुए कहा है कि जयपुर, बोलखेड़ा, ग्रीन पार्क दिल्ली, नोएडा, अजमेर, मुंबई के बाद सप्तम अधिवेशन का आयोजन देहरा तिजारा में हो रहा है। आयोजन को लेकर तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है तो वही आचार्य वसुनंदी महाराज ससंघ का 13 अप्रैल को तिजारा में मंगल प्रवेश होगा।

संजय जैन बड़जात्या कामां से प्राप्त जानकारी के साथ अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंज मंडी कीरिपोर्ट

गुरुमुख से सुना वंदना करना सीखो : निर्यापक मुनि श्री समयसागर जी

 





गुरुमुख से सुना वंदना करना सीखो   :  निर्यापक मुनि श्री समयसागर जी 


कुंडलपुर  ।  दमोह जिले के सुप्रसिद्ध जैन तीर्थ कुंडलपुर में विश्व वंदनीय संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के जेष्ठ श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि आप लोगों ने पढ़ा होगा दर्शन पाठ में एक कारिका आती है दर्शनेन जिनेंद्रानाम-------अंजलि बना लूं और उसमें एक-एक बूंद जल डाला तो वह रिस जाता है। इसी प्रकार जिनेंद्र भगवान के दर्शन और मुनींद्रों के दर्शन करने से चिर संचित जो पाप हैं एक क्षण में क्षय को प्राप्त हो जाते हैं ।दर्शन पाठ की कारिका का यह भाव है हमने कितने बार जिनेंद्र भगवान के दर्शन किए कितने बार मुनींदों के दर्शन किए इस उपरांत भी वह पाप गल क्यों नहीं रहा। वह पाप समाप्त क्यों नहीं हो रहा है ।क्षय को क्यों नहीं प्राप्त हो रहा है ।अब उत्तर क्या मिलेगा ,उत्तर यही मिलेगा उस कारिका को तो पढ़ लिया उसको आत्मसात नहीं कर पाए ।प्रसंग गुरुदेव के मुख से यह सुना की वंदना करना सीखो मैं बैठे-बैठे सुन रहा था मन में विचार आया गुरुदेव ने क्या कहा कि वंदना करना सीखो ।इसका अर्थ है प्रभु के सामने खड़े होने से वंदना नहीं होती मन भी खड़ा होना चाहिए ।हम तो प्रतिमावत खड़े हो गए पर मन हमारा कहां जा रहा मन में कौन-कौन सी अपेक्षाएं उत्पन्न हो रही उन अपेक्षाओं के साथ प्रभु की आराधना है वह आराधना नहीं मानी जाती। समीचीन आराधना हम करते हैं तो मोह कर्म के ऊपर प्रभाव पड़े बिना रह नहीं सकता। गुरुदेव के जो संकेत हैं उस पर हमारा ध्यान जा रहा बंदना करना सीखो हम अब तक नहीं सीख पाए यदि करते तो इस धरती पर नहीं होते ।मोक्ष की यात्रा होती संसार का परिभ्रमण होता है। प्रति समय आत्मा में परिणाम उत्पन्न होते रहते हैं और वे परिणाम शुभातमत भी होते हैं और अशुभातमत भी परिणाम होते हैं ।परिणाम का होना अलग वस्तु और परिणाम का कट जाना अलग वस्तु ।गुरुदेव हम लोगों को बार-बार प्रतिदिन प्रसंग बनाकर संबोधित करते थे वे वर्तमान में उपस्थित नहीं है किंतु भावों का तारतम्य  बना रहे तो निश्चित रूप से परिणामों में उज्जवलता आ सकती है ।वह परिणाम जो होते हैं उसमें निश्चित रूप से पूर्व में अज्ञान दशा में जो भी पाप का अर्जन किया है उसके प्रतिफल के रूप में जब कर्म उदय में आते है तो उपयोग को प्रभावित कर सकता है ।कर सकता है इसलिए कह रहा हूं यदि अनिवार्य रूप से वह प्रभाव डाले तो फिर कर्मबंध की जो श्रृंखला है या उसकी जो परंपरा है वह कभी भी टूट नहीं सकती है। पुरुषार्थ के माध्यम से उस परंपरा को तोड़ने का पुरुषार्थ किया जा सकता है ।जिसके अंदर कर्मबंध के जो हो रहा है वंध उसको तोड़ने का पुरुषार्थ वह कर लेता है और दूसरी बात यह है कि जिसको कर्मबंध की कोई चिंता नहीं है उसके लिए? क्वशचन मार्क जिसको कर्मबंध की कोई चिंता नहीं है भगवान का उपदेश भी प्रभाव डालने वाला नहीं है। हम कह रहे जब भगवान अनंत शक्ति के धारक हैं, विश्व को जानने वाले हैं उनका ज्ञान अपने आप में क्षायिक ज्ञान माना जाता है। दर्पणाते जिसको आप लोग बोलते हैं उनकी दिव्य ध्वनि में जो बात आती उनकी दिव्य ध्वनि की विराटता को कौन स्पष्ट कर रहे हैं गणधर परमेष्ठी जो द्वादशांग के पाटी माने जाते हैं गणधर पद पर आसीन हैं वे भी प्रभु की आराधना निरंतर करते रहते हैं और जो मुमुक्षु भव्य जीव है वह कल्याण करना चाहता है उसके लिए वह उपदेश देते हैं और उपदेश का प्रभाव भी उसी के ऊपर पड़ता है ।विस्मय सा होता  कि अतीत में कितने बार अवसर प्राप्त  हुए होंगे किसी को ज्ञात नहीं है कितने बार उपदेश सुने होंगे इसका ज्ञात नहीं किसी को ज्ञात है कितनी बार सुन लिया बार-बार सुनाओ ऐसा बोलते आचार्य महाराज सुना नहीं है क्योंकि कर्तव्य को गौण किया नहीं जा सकता भरी सभा में सब सुन रहे हैं मनोयोग के साथ धर्म की जो आराधना करता है उसके लिए धर्म श्रवण का लाभ मिल सकता है सुनने के लिए कर्णद्रिय है जिसके माध्यम से शब्द को ग्रहण किया जाता है। किंतु जिसके पास मन नहीं है मात्र कानों के द्वारा उस वाणी को ग्रहण कर रहा है, सुन रहा है न वह दूसरे को सुना पाएगा ना वह स्वयं ग्रहण कर पाएगा उसका अर्थ उसको समझने की क्षमता मन के पास है ।मन को जितने भी सुनने को बैठे हैं श्रोतागण, श्रोतागण उनको मान रहा आप समझ ले जो वृति है वह अलग है उनके पीछे जो बैठे हैं उनको मैं श्रोता के रूप में स्वीकार करता हूं। उनको यह उपदेश है जिन्होंने गुरुदेव के उपदेश और आदेश को आत्मसात करके जो साधना में  रत हैं यथायोग्य व्रतो का पालन करने के लिए जो निरंतर प्रयास रत है उनको उपदेश नहीं है आप ही लोग बोलते जो सो रहा उसको क्या जगाना जो जाग रहा है उसको क्या सुनाना। आप लोग जागृत हैं जो जागृत है उसके लिए उपदेश काम करता है।


🙏राजेश जैन रागी /रत्नेश जैन बकस्वाहा

स्वस्ति भूषण माताजी एवं पूज्य श्री वृष्टि जी महासती जी का संघ का हुआ महा समागम







स्वस्ति भूषण माताजी एवं पूज्य श्री वृष्टि जी महासती जी का संघ का हुआ महा समागम

   जगपुरा|  परम पूजनीय भारत गौरव स्वस्ति धाम प्रणेत्री गणिनी आर्यिका 105 स्वस्ति भूषण माताजी का मंगल विहार हाडोती की प्रमुख नगरों में करते हुए कोटा की ओर हो रहा है। पूज्य गुरु मां का मंगल प्रवेश 14 अप्रैल को कोटा नगर में होने जा रहा है।


इसी क्रम में 11 अप्रैल की बेला में संतों का महा समागम हुआ।स्थानकवासी जैन संप्रदाय के ज्ञान गच्छ के प.पू. गुरुदेव श्रुतधर, पंडित प्रवर श्री प्रकाश चंद जी महाराज साहब की आज्ञा अनुवर्तीनी महासती जी पू. श्री वृष्टिजी महासतीजी, 

पू.श्री चेतनाजी महासतीजी 

पू. श्री तेजस्विनीजी महासतीजी

पू.श्री विरतीजी महासतीजी, का गुरु मां स्वस्ति भूषण माताजी से महामिलन हुआ। यह महामिलन अपने  आप में एक अनुकरणीय उदाहरण दे गया। और वात्सल्य अंग का भी अभूतपूर्व उदाहरण प्रस्तुत कर गया। काफी समय तक दोनों ने एक दूसरे की शरीर व स्वास्थ्य की कुशलश्रेम पूछी, रत्नत्रय की शाता पूछी। निश्चित रूप से यह एक यह मिलन नहीं। एक नया पर्याय बन गया। 

    जैन जगत के लिए एकता की अनुकरणीय मिसाल है।


पूज्य गुरु मां का 10 अप्रैल की संध्या बेला में अलनिया में भगत पब्लिक स्कूल में रात्रि विश्राम हुआ विश्राम से पूर्व स्कूल प्रबंधक नरेश निशा वेद ने गुरु मां स्वस्ति भूषण माता जी का मंगल आशीर्वाद लिया। पूज्य गुरु मां की गुरुवार की मंगल आहारचर्या विमल जैन वर्धमान ज्वैलर्स के फार्म हाउस पर संपन्न हुई।

 

  

       अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929717312

कलाकुंज जैन मंदिर में मनाया दो तीर्थंकरों का मोक्षकल्याणक महोत्सव

 








कलाकुंज जैन मंदिर में मनाया दो तीर्थंकरों का मोक्षकल्याणक महोत्सव


*आगरा*8 अप्रैल को आगरा के  मारुति स्टेट स्थित श्री महावीर दिगम्बर जैन मंदिर कलाकुंज में वात्सल्य सेवा समिति के तत्वावधान में जैन धर्म के 14 तीर्थंकर श्री अनंतनाथ भगवान एवं 18वें तीर्थंकर श्री अरहनाथ भगवान का निर्वाण कल्याणक महोत्सव बडे़ ही धूमधाम के साथ मनाया गया। भक्तों ने   सर्वप्रथम श्रीजी का अष्टद्रव्यों से भक्तिभाव से पूजन किया। इसके बाद भक्तों ने भैया दीपांक जैन के कुशल निर्देशन में सामूहिक रुप से निर्वाण कांड का वाचनकर भगवान अनंतनाथ  एवं भगवान अरहनाथ के समक्ष निर्वाण लाडू अर्पित किया| इस दौरान भक्तों का उत्साह देखते ही बन रहा था। इस अवसर पर अजय जैन,राजीव जैन,रविंद्र जैन,आशु जैन भगत,मुकेश जैन भगत,शुभम जैन,प्रवीण कुमार (अध्यक्ष ) रश्मि जैन,कविता जैन,रीता जैन,निशा जैन,शोभा जैन,करुणा जैन ममता जैन,रंजना जैन,सुनीता जैन पूनम जैन,समस्त कलाकुंज जैन समाज के लोग बड़ी संख्या में मौजूद रहे|


दीक्षार्थी शकुंतला जैन की गोद भराई के साथ निकाली गई शोभा यात्रा









दीक्षार्थी शकुंतला जैन की गोद भराई के साथ निकाली गई शोभा यात्रा

  रामगंजमंडी | दीक्षार्थी शकुंतला जैन की सोमवार की संध्या बेला में शोभायात्रा निकाली गई एवं गोद भराई की गई। यह शोभा यात्रा काला निवास राजस्थान मील से प्रारंभ हुई जो नगर के प्रमुख मार्गो से होते हुए शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर पहुंची। यह 25 अप्रैल को आचार्य श्री 108 इंद्रनंद जी महाराज एवं निपुण नंदी जी महाराज से डिग्गी मालपुरा में दीक्षा ग्रहण करेंगी। जिस भी मार्ग से यह शोभायात्रा गुजरी जगह-जगह दीक्षार्थी की गोद भराई कर उनका स्वागत किया गया। शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर पहुंचने पर उन्होंने मूलनायक शांतिनाथ भगवान के दर्शन किए। उसके उपरांत सम्मान सभा का आयोजन किया गया। जिसमें सर्वप्रथम दीक्षार्थी के परिवार जनों का अभिनंदन किया गया। उसके उपरांत सर्वप्रथम नगर गौरव ब्रह्मचारिणी रीना दीदी द्वारा दीक्षार्थी दीदी की गोद भराई की गई। इसके उपरांत श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन महिला मंडल द्वारा दीक्षार्थी दीदी की गोद भराई कर उनका अभिनंदन किया गया। दीक्षार्थी के परिवार जनों का सम्मान समाज की और से अध्यक्ष दिलीप कुमार विनायका, उपाध्यक्ष चेतन कुमार बागड़ीया, महामंत्री राजकुमार गंगवाल, नरेश कुमार बाकलीवाल, केवलचंद लुहाड़िया आदि के द्वारा किया गया। समारोह का संचालन राजकुमार गंगवाल ने किया एवं उन्होंने दीक्षार्थी के जीवन पर भी प्रकाश डाला। इस अवसर पर प्रशांत जैन शास्त्री द्वारा दीक्षा का महत्व समझाया गया। 

        एक परिचय दीक्षार्थी शकुंतला जैन काला

  शकुंतला देवी का जन्म सन 1955 में श्री मोतीलाल जैन एवं माता श्री शांति देवी चांदवाड की बगिया में चौथ का बरवाड़ा राजस्थान में हुआ। इन्होंने दसवीं कक्षा तक शिक्षा ग्रहण की एवं इनका विवाह ताराचंद जैन सवाई माधोपुर वालों के सुपुत्र श्री कैलाश जी जैन से हुआ। इनका पूरा परिवार धार्मिक संस्कारों से परिपूर्ण रहा। इनका जीवन धार्मिक संस्कारों से परिपूर्ण रहा और लगभग 25 वर्ष पूर्व सिद्ध चक्र महामंडल विधान का आयोजन कराया,इसी के साथ इन्हीं के परिवार द्वारा एवं इन्हीं की प्रेरणा से टोंक में पदम प्रभु भगवान की प्रतिमा स्थापित की। इसी के साथ भगवान की वेदी निर्माण में भी इनके द्वारा सहयोग किया गया। इनका परिवार भामाशाह कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं है धर्मशाला में  भी कमरों के निर्माण, संत निवास, औषधालय आदि में इनके द्वारा सहयोग दिया जाता रहा है। यह सदा से संत सेवा में साधु के आहार विहार में अपनी पूर्ण सहभागिता देती रही है। इन्होंने कई पंचकल्याणकों में भी भाग लेकर इंद्र इंद्राणी बनाकर धर्म आराधना की है। सन 2018 में आचार्य श्री 108 इंद्रनंद जी महाराज द्वारा अतिशय क्षेत्र सांखना में कराए गए पंचकल्याणक में इन्हें भगवान के माता-पिता बनने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ। कई वर्षों से उनकी इच्छा रही कि मैं संसार का त्याग कर दीक्षा को ग्रहण करूं लेकिन यह समय अब आया है। जो निश्चित रूप से अनुमोदनीय है।

        अभिषेक जेन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

भावी आचार्य श्री 108 समय सागर जी महामुनिराज का कुण्डलपुर में हुआ ऐतिहासिक भव्य मंगल प्रवेश पद विहार में हजारों भक्तों के हुजूम में रहा जबरदस्त जोश दो वर्ष बाद पहुंचे मुनि श्रेष्ठ की 108 पिच्छिधारियों ने भी की अगवानी 16 अप्रैल को होगा आचार्य पदारोहण महामहोत्सव













भावी आचार्य श्री 108 समय सागर जी महामुनिराज का कुण्डलपुर में हुआ ऐतिहासिक भव्य मंगल प्रवेश 

पद विहार में हजारों भक्तों के हुजूम में रहा जबरदस्त जोश

दो वर्ष बाद पहुंचे  मुनि श्रेष्ठ की 108 पिच्छिधारियों ने भी की अगवानी

16 अप्रैल को होगा आचार्य पदारोहण महामहोत्सव


कुण्डलपुर   ।  सुप्रसिद्ध जैन तीर्थ कुंडलपुर की पावन वसुंधरा पर बड़े बाबा की मंगल छत्रछाया में आचार्य पदारोहण महोत्सव 16 अप्रैल 2024 को आयोजित किया जाएगा। परम पूज्य समाधिस्थ समाधि सम्राट, युगश्रेष्ठ, संत शिरोमणि, छोटे बाबा,आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के सभी शिष्य पूज्य बड़े बाबा के श्रीचरणों में पहुंच रहे हैं । मुनि व आर्यिका संघों  की कुंडलपुर में निरंतर शुभागमन हो रहा है। मंगलवार 9 अप्रैल को ज्येष्ठ श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 समय सागर जी महाराज ससंघ का भव्य मंगल प्रवेश बड़े बाबा के दरबार में हुआ , साथ ही निर्यापक मुनिश्री 108 वीर सागर जी महाराज ससंघ सहित अनेक साधुओं का मंगल प्रवेश हुआ।

       इस अवसर पर निर्यापक मुनिश्री की ऐतिहासिक भव्य अगवानी में देशभर से हजारों हजार श्रद्धालु भक्तों में जबरदस्त जोश रहा , जिन्होंने पटेरा से कुण्डलपुर तक गगनभेदी जयकारों से गूंज उठा। पटेरा नगर से जैसे ही पूज्य मुनि श्री ने संघ सहित मुनि आर्यिकाओं 108 पिच्क्षियों के संघ के साथ कुंडलपुर की ओर विहार किया, पटेरा से लेकर कुंडलपुर तक भारी जनसैलाब पूरे रास्ते में उमड़ता रहा । इस दौरान गौशाला ,हथकरघा, प्रतिभास्थली, पूर्णायु चिकित्सालय, भाग्योदय, शांति धारा दुग्ध योजना आदि की विशेष झांकियां समाज को आचार्य श्री के द्वारा शुरू किए गए जीव दया के कार्यों के बारे में बताती हुई विभिन्न संदेश दे रही थी , वहीं हाथी ,घोड़ा , ढोल , अखाड़ा , ध्वज , तखक्तियां , लेजिम  , नृत्य बैंड , डांडिया , छतरी ,भजन मण्डल , कलश मंडली , ध्वज मंडली, व्यायाम शाला , शेर नृत्य, बधाई नृत्य, बरेदी नृत्य, पाठशाला , बालिका मंडल, दलदल घोडी पार्टी, दिव्यघोष पार्टी, व्यायाम शाला , महिला पार्टी, दिव्य घोष, डमरू पार्टी  , नगड़िया, विभिन्न झांकियां आदि जो पथरिया, दमोह , हटा,सागर ,बीना ,खुरई, बंड़ा शाहपुर,खिमलासा , जबेरा ,अशोकनगर ,दयोदय,खिमलासा ,गढ़ाकोटा ,रहली, जरूवाखेड़ा ,नरयावली ,मंडला, शहडोल, विदिशा, पन्ना टीकमगढ़ , मड़ावरा , छतरपुर , शाहगढ़, हाट पिपलिया ,घोड़ी नेमावर ,हरदा ,कटनी ,सतना रीवा कटंगी ,गोसलपुर ,गंजबासौदा, मंडी बामोरा , बेगमगंज ,मैहर, भोपाल, उज्जैन, शाहपुरा भिटोनी, सहजपुर, ललितपुर , बीना बारह के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय श्याम बैंड सम्मिलित रहे। 

       जयकुमार जलज हटा तथा राजेश जैन रागी बकस्वाहा ने बताया कि इस अवसर पर निर्यापक मुनि वीरसागर जी महाराज तथा ज्येष्ठ आर्यिकारत्न गुरुमति माताजी आर्यिकारत्न श्री  द्रणमति माताजी आर्यिकारत्न श्री गुरुमति माताजी ससंघ सहित अनेक साधु संत , बडी संख्या में ब्रह्मचारी भैयाजी व दीदी जी अगवानी में शामिल रहे।  कुंडलपुर की पावन धरा पर पहुंचते ही कुंडलपुर में पूर्व से विराजमान निर्यापक संघ , मुनि संघो एवं आर्यिका संघो ने निर्यापक मुनि श्री समय सागर जी महाराज की भव्य अगवानी की और सभी निर्यापक मुनि श्री 108 योग सागर जी, मुनि श्री 108 नियम सागर जी ,मुनि श्री 108 सुधासागर जी ,मुनि श्री 108 समता सागर जी ,मुनि श्री 108 प्रसादसागर जी, मुनि श्री 108 अभयसागर जी, मुनि श्री 108 संभव सागर जी ,मुनि श्री 108 वीरसागर जी, मुनि श्री 108 प्रमाण सागर जी ,मुनि श्री 108 प्रणम्यसागर जी  सहित सभी मुनिराज , आर्यिका माताजी सहित सभी शिष्यों का भव्य मंगल मिलन तथा मुनिओं द्वारा पाद प्रक्षालन का दृश्य अद्वितीय था।

     इस मौके पर विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त बैंड, भारत के प्रसिद्ध 21 दिव्य घोष, 36 रथ, 111 सदस्यों का अखाड़ा, डो्न से सुगंधित जल व पुष्प वर्षा , आचार्यश्री एवं मुनि समय सागर जी की हजारों छवियां चित्र, 2000 धर्म ध्वजाएं, 111 विशेष ध्वजाएं, 111 ढोल नगाड़े , हटा से सर्वोदय बालिका मंडल की लेजम का प्रदर्शन करती बालिकाएं एवं दिव्य घोष, आकर्षण का केंद्र रहें। इस मौके पर सागर, दमोह , हटा, पटेरा,जबलपुर, बंडा,  मुंगावली ,देवरी ,पथरिया , बकस्वाहा , बम्हौरी, बीना बारह,नैनागिरि , द्रोणगिरि जी, बड़ामलहरा, शाहगढ़, ललितपुर ,टीकमगढ, छतरपुर सहित देश के कोने कोने के सैकड़ो नगर ग्रामो के हजारों भक्त श्रद्धालु अगवानी के पलों को खास बनाते जा रहे थे । मुनि संघ का जगह-जगह रंगोली सजाकर भक्तों एवं कुंडलपुर क्षेत्र कमेटी, कुंडलपुर महोत्सव समिति द्वारा पाद प्रक्षालन किया गया । 

 वरिष्ठ पत्रकार राजेश जैन रागी,रत्नेश जैन बकस्वाहा,संकलन,कोडरमा मीडिया राज कुमार जैन अजमेरा

महातीर्थ कुण्डलपुर में विराजमान🚩

 

सन्त शिरोमणि आचार्य देव श्री १०८ विद्यासागर जी महाराज से दीक्षित

              

(9 निर्यापक श्रमण+68 मुनिराज=77 मुनिराज)

10 अप्रैल 2024


भावी आचार्य परम पूज्य मुनिश्री समय सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री योग सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री नियम सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री सुधा सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री समता सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री पवित्र सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निर्वेग सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री विनीत सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निर्णय सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री प्रबुद्ध सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री प्रसाद सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री अभय सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री प्रशस्त सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री प्रयोग सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री प्रबोध सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री प्रणम्य सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री प्रभात सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री चन्द्र सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री अजित सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री सम्भव सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री पद्म सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री चन्द्रप्रभ सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री पूज्य सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री धर्म सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री मल्लि सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री सुव्रत सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री वीर सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री आगम सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री महा सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री विराट सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री शैल सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री अचल सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री पुनीत सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री विशद सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री सौम्य सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री विनम्र सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री अतुल सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री भाव सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री आनन्द सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री सहज सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निस्वार्थ सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निर्दोष सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निर्लोभ सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री नीरोग सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निर्मोह सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निष्पक्ष सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निस्पृह सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निश्चल सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निष्कम्प सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निरामय सागर जी महाराज 

पूज्य मुनिश्री निरापद सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निराकुल सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निरुपम सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निष्काम सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निरीह सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निस्सीम सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निर्भीक सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री नीराग सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री नीरज सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निर्मद सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निसर्ग सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निस्संग सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री शीतल सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री शाश्वत सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री श्रमण सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री संस्कार सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री ओमकार सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निर्ग्रन्थ सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निर्भ्रान्त सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निरालस सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निरास्रव सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निराकार सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निश्चिन्त सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निर्माण सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निःशंक सागर जी महाराज

पूज्य मुनिश्री निर्लेप सागर जी महाराज

 

✍🏻आयुष जैन कोटा

🚩☀️पुण्योदय विद्यासंघ🚩☀️

add

https://www.amazon.in/MMTC-PAMP-Lotus-24k-999-9-Gold/dp/B08KSPYJX2?keywords=GOLD+COIN&qid=1699455659&sr=8-3-spons&sp_csd=d2lkZ2V0TmFtZT1zcF9hdGY&psc=1&linkCode=ll1&tag=anushka0f28-21&linkId=4f374efcd73053f73635c7cb35e093dd&language=en_IN&ref_=as_li_ss_tl